Friday, December 10, 2010

शुक्र और शिकायत {Ghazal} - Farookh Qaisar

अपना ग़म भूल गए तेरी जफ़ा भूल गए
हम तो हर बात मुहब्बत के सिवा भूल गए

हम अकेले ही नहीं प्यार के दीवाने सनम
आप भी नज़रें झुकाने की अदा भूल गए

अब तो सोचा है दामन ही तेरा थामेंगे
हाथ जब हमने उठाए हैं दुआ भूल गए

शुक्र समझो या इसे अपनी शिकायत समझो
तुमने वो दर्द दिया है कि दवा भूल गए

10 comments:

एस.एम.मासूम said...

क्या बात है अनवर जमाल साहब? यह किस से शिकायत हो रही हैं?

DR. ANWER JAMAL said...

@ जनाब मासूम साहब ! आप बेफ़िक्र रहिए आपसे तो हरगिज़ नहीं हो रही है ।
अब आप 'अमन का पैग़ाम' कहाँ दे रहे हैं ?

कुछ अता पता तो दीजिए जनाब !

DR. ANWER JAMAL said...

@ जनाब मासूम साहब ! आप बेफ़िक्र रहिए आपसे तो हरगिज़ नहीं हो रही है ।
अब आप 'अमन का पैग़ाम' कहाँ दे रहे हैं ?

कुछ अता पता तो दीजिए जनाब !
2. ahsaskiparten.blogspot.com
पर भी आकर nice post देखिए 'औरत की पवित्रता और सुरक्षा के संबंध में' !

DR. ANWER JAMAL said...

:)
@ हंसमुख भाई ! आप हंसे लेकिन यह कोई हास्य कविता नहीं है ।

2, दूसरे ब्लाग पर . ओशो की बात पर भी आप हंसे , उनकी बात पर क्यों हंसे आप ?

Hansmukh said...

:)

शेखचिल्ली का बाप said...

वाह वाह !

शेखचिल्ली का बाप said...

केसर जी की शायरी से तो मेरे मन की दुनिया ही गर्मा गई ।

शेखचिल्ली का बाप said...

हुजूर एक बार गरीबखाने को भी नवाज़ दीजिए , इस ज़र्रा ए नाचीज़ के ब्लाग पर टिप देकर .

URDU SHAAYRI said...

हर शेर जानदार है

URDU SHAAYRI said...

शुक्र और शिकायत का बेजोड़ जोड़ पेश किया है आपने .