Saturday, April 28, 2012

विवाद -एक लघुकथा डा. अनवर जमाल की क़लम से Dispute (Short story)

जंगल में लकड़बग्घों का एक समूह रहता था। जवान लकड़बग्घे शिकार करते, बच्चे खिलवाड़ करते और बूढ़े इंतेज़ार।
एक दिन छोटे छोटे बच्चों ने देखा कि कुछ जवान लकड़बग्घों ने एक हिरन के पीछे दौड़ लगाई और फिर उसे घेर कर पकड़ लिया। किसी लकड़बग्घे ने उसके कूल्हों में अपने पंजे गड़ाए तो किसी ने अपने मुंह से उसके पैर पकड़ लिए और किसी ने उसकी गर्दन दबा ली। तड़पते हुए हिरन ने भी हाथ पांव मारे। बच्चों के सामने शिकार का यह पहला मौक़ा था। उन्होंने यह मंज़र पहली बार देखा था। वे भाग कर अपने बूढ़ों के पास पहुंचे और बोले-‘बाबा, बाबा, वहां न, एक हिरन बहुत झगड़ा कर रहा है।‘
बूढ़ों ने इत्मीनान से जवाब दिया-‘बच्चों ये हिरन बहुत बदमाश होते हैं। जब भी पकड़ो तभी विवाद शुरू कर देते हैं।
बच्चों ने मुड़कर हिरन की तरफ़ देखा। उसके हाथ पांव अब नहीं हिल रहे थे। विवाद पूरी तरह शांत हो चुका था।
बूढ़ा बरगद, नीम, पीपल और झाड़ियां बस ख़ामोश तमाशाई थे। वे कभी विवाद में नहीं पड़ते।


Monday, April 16, 2012

लंबी उम्र जीने के लिए आपको बढ़िया सेक्स करना चाहिए Sex Therapy

हम्ममम... तो आप लंबी उम्र जीना चाहते हैं। अच्छी बात है। लेकिन यदि हम आपको ये बताएं कि लंबी उम्र जीने के लिए आपको बढ़िया सेक्स करना चाहिए, तो क्या लंबी उम्र के इस नुस्खे पर अमल करेंगे ?

यह सच है कि जब जब आप बहुत बढ़िया, तूफानी, तन और मन को झकझोर कर रख देने वाला सेक्स करते हैं तो आपकी जिन्दगी में 10 साल और जुड़ जाते हैं।

वैसे तो हर कोई हर उम्र में बढ़िया सेक्स करना चाहता है लेकिन हर कोई, यह आमतौर पर, नहीं जानता है कि नियमित रूप से जबरदस्त सेक्स करने से आपके उम्र में 8 साल तक का इजाफा हो सकता है। यही नहीं, जितने ज्यादा ऑर्गैज्म (सेक्स का चरम) आप महसूस करेंगे, उतना ही ज्यादा आपके अधिक जीने की संभावना बढ़ेगी।

दरअसल रेग्युलर सेक्स से हॉरमोन लेवल बेहतर होता है, आपके दिल की सेहत भी बढ़िया होती है। यही नहीं, आपके दिमाग की पावर भी बढ़ती है और आपकी रोगों से लड़ने की क्षमता भी विकसित होती है। तो देखिए है न यह एक पंथ दो काज? आनंद के साथ यौवन भी बरकरार... और उम्र में भी बढ़ोतरी।

कुछ और टिप्स ले लीजिए हमसे ताकि आप लंबी उम्र पाने के अपने मकसद में कामयाब हो सकें-

आर्गेज्म के लिए कोशिश करें

ज्यादा से ज्यादा सेक्स करना फायदेमंद उतना नहीं, जितना कि एक अच्छा, ऑर्गेज्म देने वाला सेशन है। क्वालिटी क्वांटिटी से ज्यादा मायने रखती हैं। एक स्टडी के अनुसार, ऑर्गेज्म शरीर में होने वाले इंफेक्शन्स से लड़ने में मदद करते हैं और यह मदद 20 पर्सेंट तक हो सकती है। बुढ़ापे में ऑर्गेज्म पाने वाले पुरुष उन पुरुषों से दोगुना लंबी उम्र जी सकते हैं जो सेक्स नहीं करते हैं। और, औरतें तो आठ साल ज्यादा लंबा जी सकती हैं।

ऑर्गेज्म के जरिए आपके शरीर में ऐसे केमिकल्स का प्रवाह बढ़ता है जो मूड बूस्ट करते हैं। आप रिलैक्स होते हैं और आपकी अपने पार्टनर के साथ इमोशनल बॉन्डिंग मजबूत होती है। खुशहाल कपल्स की आयु सिंगल लोगों और एक खराब रिलेशनशिप में जीने वाले लोगों के मुकाबले ज्यादा होती है।

जो महिलाएं एक हफ्ते में दो बार ऑर्गेज्म प्राप्त करती हैं, उनमें ऐसी महिलाओं के मुकाबले जो कि सेक्स का भरपूर आनंद नहीं ले पाती हैं, हार्ट डिजीज का खतरा 30 पर्सेंट तक कम होता है।

उम्र बढ़ी: आठ साल तक

और.. और.. और...!

यदि आप सप्ताह में एक बार सेक्स करते हैं, यानी कम से कम एक बार तो कर ही लेते हैं, तो आपका हॉरमोन लेवल, हार्ट और ब्रेन- तीनों चीजें टॉप कंडीशन में रहेंगी। और, आप जितना ज्यादा करेंगे यानी एक सप्ताह में तीन या उससे ज्यादा बार, तो आपको हार्ट अटैक का खतरा 50 पर्सेंट तक कम हो जाएगा।

साल बढ़े: दो साल तक।

'तूफानी' सेक्स करें
उम्मीद है तूफानी सेक्स से आप हमारा मतलब समझ गए होंगे। एक ऐसा सेक्स सेशन जिसमें बहुत सारा पैशन हो और वह आपको थका दे। जब आप बीमारी से उठे हों, थके हों, सेक्स करने की इच्छा कम हो, तब ब्रेन में इन चारों में से किसी एक केमिकल की कमी हो जाती है- डोपामाइन ( dopamine ), ऐसीटिकॉलिन ( acetylcholine ), गाबा ( GABA ) और सेरोटिन ( serotonin )। ऐसे में तूफानी सेक्स फायदेमंद होगा।

मूड अच्छा करने के लिए डोपामाइन बढ़ाना जरूरी है। इसके लिए बेसिल, ब्लैक पेपर, मिर्चें, अदरक, जिंजर और हल्दी का सेवन करें। ऐसीटिकॉलिन अलर्टनेस बढ़ाने और फोकस बढ़ाने के लिए जरूरी है। इसके लिए मसालेदार चीजें, बेसिल, पेपरमिंट, तेजपत्ता लें। गाबा कुदरती दवा है अवसाद हटाने की। यह रेड वाइन में मिलता है। सेरोटिन खुशी और रिलैक्सेशन की भावना बढ़ाता है। यह केले और चॉकलेट में पाया जाता है।

साल बढ़े: 10 साल तक।

स्वस्थ रहने में सहायक
एक स्टडी कहती है कि यदि हफ्ते में दो बार अच्छा सेक्स करेंगे तो शरीर में ऐंटिबॉडीज का लेवल बढ़ेगा जिससे शरीर की कोल्ड और फ्लू से रक्षा होगी। और जो लोग ऐसा नहीं करते हैं, स्टडी कहती है कि, उन्हें इन चीजों से दो-चार ज्यादा होना पड़ता है।

तो दोस्तो, जितना जरूरी हफ्ते में 5 दिन ऑफिस में 'काम' करना है, उतना ही जरूरी हफ्ते में दो दिन बेडरूम में 'काम' करना है। 
Source : http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/12688137.cms

Sunday, April 15, 2012

गुल्लक (कहानी) -विकेश निझावन


          -ममी! इस बार कितने दिन के लिये आई हो? शिप्रा ने आईने पर से नज़र हटाते हुए मेरी ओर देखते हुए पूछा तो मैं खिलखिला कर हँस दी।  शिप्रा को बाँहों में भरते हुए मैंने कहा- मेरी बेटी जब तक चाहेगी मैं उसके पास रह लूँगी।            -अगर मैं वापिस ही न जाने दूँ...?
           -तो हम नहीं जाएँगे।
           -सच कह रही हो ममी?
           -क्या हम अपनी बेटी से झूठ बोलेंगे?
           -आई लव यू ममी! आई रियली लव यू! शिप्रा ने मेरे दाएँ गाल पर किस किया और मेरी बाँहों का घेरा तोड़ते हुए बाहर को भाग गई।

            शिप्रा के इस निश्छल स्नेह को मैं समझ पा रही थी। यकीनन मेरे प्यार के लिए वह अतृप्त है। इस पूरे साल के बीच मैं बहुत ही कम आ पायी हूँ। सरकारी नौकरी में कितना काम है कितने बन्धन हैं -इन बातों को शिप्रा क्या समझे। उसकी यह उम्र भी तो नहीं है ये सब समझने की। लेकिन इस बार अपनी इस लम्बी छुट्टी के बीच मैं उसे पूरी तरह से अतृप्त कर ही दूँगी। अपना पिछला एकाकीपन भी भूल जाएगी वह।
             मैं तो अपनी छुट्टियों का भूली ही चली जा रही थी। वर्मा साहब ने रजिस्टर पर नज़र दौड़ाते हुए मुझे कनखियों से देखते हुए कहा था- मिसेज श्रीवास्तवा क्या इस बार श्रीवास्तव साहब से झगड़ा करके आयी हैं?
            -क्या मतलब? मैं चौंकी थी।
            -साल खतम होने जा रहा है।
            -फिर?
             अब तो कुछ रोज़ साहब के पास जाकर रह लीजिए।
            -कैसी बात करते हैं वर्मा साहब! हमारे साहब हमें चाहते हैं और हम उन्हें चाहते हैं यह तो सच है। लेकिन विदाउट पे छुट्टी लेकर घर पर रहना न उन्हें गँवारा है न हमें।
           -भई वही तो बताने जा रहा था। आपकी तो ढेर छुट्टियाँ बन रही हैं। इस पूरे वर्ष में केवल तीन ही तो छुट्टियाँ ली हैं आपने।
            केवल तीन! जतिन की शादी पर ... अरे! मैं तो कन्फयूज़ हो जाती हूँ। वह तो पिछले साल की बात थी। यह वर्ष इतनी तेज़ी से गुज़र गया पता ही नहीं चला। इस बार छुट्टियों में बच्चे यहाँ पर आ गये थे सो उनसे दूरी का पता ही नहीं चला। यों तो उनसे एक-एक पल की दूरी सालती है लेकिन काम के बोझ से इतना दब जाती हूँ कि मुझे उन्हें अपने से दूर रखना ही पड़ता है। यों पिछली बार मेरे चेहरे को देखते हुए पापा ने अनायास कह दिया था- अपनी सेहत का ध्यान रखो। जब बच्चों को हमारे पास छोड़ा है तो हम पर विश्वास भी रखना होगा। यह बात केवल पापा ने ही नहीं ममी भैया और भाभी ने भी कही थी। सच में उनके इन शब्दों से मुझे कहीं भीतर तक राहत मिली थी और मैं बच्चों को लेकर पूरी तरह से निश्चिन्त हो आई थी।

           पिछली छुट्टियों में मैंने देव से फोन पर कह दिया था- मैं इस बार नहीं आ पाऊँगी। नये डायरैक्टर आए हैं अभी हमें उन्हें और उन्हें हमें समझने में समय लगेगा।
           मेरी इस बात पर देव हँस पड़े थे- भई तुम्हें आने के लिये कह कौन रहा है। छुट्टियाँ शुरू होते ही मैं बच्चों को तुम्हारे पास छोड़ जाऊँगा।
           देव जिस रोज़ आए थे अगले रोज़ ईद की छुट्टी थी। एक रोज़ छोड़ कर रविवार था जिस वजह से देव ने चार छुट्टियाँ बना ली थीं। इन चार दिनों को खूब जिया था हमने। ईद के मेले पर शिप्रा और अर्शी ने ढेरों छोटी-छोटी चीज़ें खरीद डाली थीं। लेकिन घर आकर महसूस किया कि अर्शी को अपनी बन्दूक और शिप्रा को अपनी मिट्टी की बत्तख के आकार वाली गुल्लक बहुत पसन्द थी। मेरे पर्स में पड़ी आठ-दस रूपये की रेजगारी शिप्रा ने घर में आते ही अपनी गुल्लक में ड़ाल ली थी।
            हर सुबह उठते ही शिप्रा गुल्लक मेरे सामने ले आती- ममी इसमें कुछ कॉयन्स डालिये न! मुझे अच्छा लगा था कि बच्चे इन छोटी-छोटी चीज़ों के मोह में मुझसे दूर रह सकते हैं।
           छुट्टियाँ खतम होने पर देव बच्चों को लेने आए तो शिप्रा का चेहरा उतर गया था। अर्शी नाना-नानी को बराबर मिस कर रहा था लेकिन शिप्रा ने नाना-नानी के नाम पर कोई उत्सकता जाहिर नहीं की। जाने क्यों वह मेरे चेहरे की ओर देखने लगी तो मैंने तपाक से कहा- नाना-नानी से भी हर रोज़ कॉयन्स डलवाती रहना। फिर देखना गुल्लक जल्दी ही भर जाएगी।
          पल भर के लिये शिप्रा के होंठ फैले थे लेकिन अगले ही पल फिर सिकुड़ कर रह गये। जाते हुए उसने बॉय किया था लेकिन शब्द उसके होंठों पर नहीं थे। मैं समझ गई थी शिप्रा अब बड़ी हो रही है। सब समझने लगी है वह।
          -पापा! एक रोज़ और रुक जाएँ? रात सोने से पहले शिप्रा ने कहा तो देव डपटकर बोले थे- दिमाग खराब हो रहा है तुम्हारा! दो महीने रह लिए क्या मन नहीं भरा तुम्हारा?  मैंने महसूस किया था कि शिप्रा सहम गई है।
          देव के यहाँ से रवाना होते ही मैंने ममी-पापा से फोन पर कह दिया था कि वे शिप्रा का विशेषरूप से ध्यान रखें। शी इज़ मोर सेन्सिटिव।
          -ममी राघव हमें खेलने नहीं देता। शिप्रा ने अपने हाथ मेरे कंधे पर रख दिए तो मैं वर्तमान में लौटी थी- तो उसके साथ मत खेलो।
          -ममी वह गंदी-गंदी बातें करता है।
          -कहा न उसके साथ मत खेला करो। अर्शी को अन्दर बुलाओ हम मिलकर केरम खेलेंगे। मेरी बात पर शिप्रा उछल पड़ी और चहकती हुई सी अर्शी को भी भीतर बुला लाई।

          केरम की गोटियाँ सेट करते हुए अर्शी बोला- ममी राघव को भी बुला लो न! अर्शी ने नज़र उठा कर बाहर की ओर देखा तो मेरी नज़र भी उधर ही घूम गई। मैंने देखा राघव दरवाज़े की ओट में ललचाई नज़रों से हमारी ओर ही देख रहा था।
           -आओ बेटा तुम भी आ जाओ! मैंने कहा तो शिप्रा एकाएक चिल्ला उठी- नहीं ममी! इसे नहीं खिलाएँगे हम। इसे अन्दर मत आने दो। ये गन्दा है। गन्दी बातें करता है ये।
          शिप्रा और अर्शी की तरह राघव भी इस घर में पला और बड़ा हुआ है लेकिन शिप्रा की ज़िद्द के आगे मुझे स्वीकारोक्ति देनी ही पड़ी। मैंने जरा सा लहजा बदला- राघव बेटे वो बाई छत पर कपड़े डाल गई थी न वो उतार ला। मौसम खराब है कहीं बारिश ही न आ जाए। वह मुड़ने को हुआ तो मैंने पुनः उसे रोका- हाँ! एक कप गर्म-गर्म चाय भी बना दे। जरा सर में दर्द है चाय लेकर ठीक हो जाएगा। उसके बाद तू भी खेल लेना।
          -ममी! तुम्हारे सर में दर्द है तो मैं दबाए देती हूँ। तुम आराम कर लो।
          शिप्रा की बात को अर्शी ने काट दिया- चल बुद्धू कहीं की। आराम करने से सर दर्द जाएगा क्या! सर दर्द तो खेलने से जाएगा। खेलने से ममी का ध्यान बंट जाएगा। दोनों बच्चे इतने समझदार हो रहे हैं मैं कहीं भीतर तक गदगद हो आई थी।
           राघव चाय लेकर आया तो मैंने केरम एक ओर सरका दिया- तुम लोग बाहर चल कर खेलो। मैं चाय पीकर थोड़ा आराम करना चाहूँगी।
           -हाँ-हाँ चलो अर्शी और राघव हम बाहर चल कर खेलते हैं। ममी को आराम करने दो। शिप्रा अब तक राघव के प्रति अपने गुस्से को भूल चुकी थी। राघव चलते-चलते बोला- मेमसाहब छोटी मेमसाहब कब आएँगी?
           -अरे आ जाएँगी। तू चलकर अपना काम निबटा। इसे कैसे समझाती मैं कि मेरे आने पर सबको कितनी आज़ादी मिल जाती है। वरना बच्चों की वजह से सबको बंधन तो रहता ही है। जाने अपने कितने-कितने प्रोग्राम इनकी वजह से इन्हें रद्द करने पड़ते होंगे। जब ममी पापा मसूरी गये हुए थे छाया भाभी को दो बार अपनी किट्टी-पार्टी भी मिस करनी पड़ी थी - जय ने बताया था।
           कल छाया भाभी सकुचाती हुई बोली थी- दीदी आज हम ममी के यहाँ चले जाएँ?
           -अरे यह भी कोई पूछने की बात है! जरूर हो आओ। अब मैं इन दोनों के पास हूँ न!
            जय और छाया बाहर को निकले ही थे कि शिप्रा पूछ बैठी- ममी ये लोग कहाँ गए हैं?
           -कौन लोग?
           -मामा और मामी?
           -तुम्हारी मामी अपनी ममी के पास जा रही है। जिस तरह से तुम अपनी ममी के लिए उदास हो जाती हो उसी तरह से तुम्हारी मामी भी अपनी ममी के लिए उदास हो रही थी। तुम लोगों की वजह से वह अपनी ममी के पास भी नहीं जा पाती न।
            -हमारी वजह से! शिप्रा जैसे चौंकती हुई बोली- मामी तो हर सप्ताह अपनी ममी के पास जाती है।
            -हर सप्ताह! कैसी बात करती हो!
            -हाँ! अभी परसों ही तो मामी लौटी है।
            -ये कैसे हो सकता है। मैं शिप्रा की बात पर अविश्वास जताती बोली- पिछले डेढ़ माह से ममी-पापा यहाँ नहीं हैं फिर मामी तुम्हें छोड़ कर कैसे जा सकती है।
            शिप्रा के जवाब से पहले अर्शी बोल पड़ा- मामी हमें शर्मा अंकल के यहाँ छोड़ जाती है। शर्मा अंकल हमें बहुत डांटते हैं। पिछली बार हमारी पिटाई भी हो गई थी ममी। लेकिन तब हमने शर्मा अंकल से सॉरी कह दिया था। हम आगे से डिब्बे में से बिस्किट लेकर नहीं खाया करेंगे।

           ये कैसी असलियत मेरे सामने खुल रही थी। मन तो हुआ था देव से सारी बात फोन पर ही बता दूँ। मैं अकेली इस बात को झेल ही नहीं पा रही थी। जय और छाया से सीधे से बात कर पाने की हिम्मत ही नहीं है। पापा-ममी कब आएँगे इसका अभी कुछ अता-पता नहीं। यों देव से कहने का मतलब तो यही होगा कि मैं खुद ही अपने माँ-बाप और भाई-भाभी की तौहीन करने जा रही हूँ।
            काफी सोच-विचार के बाद इस निर्णय पर पहुँची थी कि मौका लगते ही अकेले में भाभी को ही समझा दूँगी।
            पच्चीस दिन की छुट्टियाँ मैंने सोचा था बहुत लम्बी होंगी। लेकिन वक्त के आगे मैं फिर हार गई। शिप्रा के सामने आह भरते हुए कहा था- बस तीन दिन और रह गये हैं मेरी छुट्टियाँ खतम होने में।
            -उसके बाद?
            -उसके बाद मुझे जाना होगा।
            -तुमने मुझसे प्रामिस किया था ममी कि अब तुम हमें छोड़ कर नहीं जाओगी।
            -नौकरी पर तो जाना ही है बेटे। 
            -नौकरी पर क्यों जाते हैं ममी? शिप्रा के इस सवाल पर मैं हँस पड़ी- नौकरी पर जाने से पैसा मिलता है। उन्हीं पैसों से तो ढेर सारी चीज़ें लाती हूँ तुम्हारे लिये। और फिर भविष्य के लिये पैसा ही तो चाहिये।
            -पैसा...! शिप्रा ने दबे से कहा था और झट से अपने कमरे की ओर भाग गयी। अगले ही पल वह लौट आयी थी। उसके हाथ में मिट्टी की गुल्लक देख मैं कह उठी- हाँ-हाँ! इधर लाओ गुल्लक मैं कॉयन्स डालती हूँ।
            -नहीं ममी पैसा मुझे नहीं पैसा तो आपको चाहिये। शिप्रा ने पटाक से गुल्लक ज़मीन पर दे मारी- आपको पैसा चाहिये न ममी। आप मेरे सारे पैसे ले लो। लेकिन प्लीज़ आप नौकरी पर मत जाओ। हम आप बिना नहीं रह सकते। देखो मैंने अब तक ढेर पैसे जमा कर लिये हैं। मैं सब आपको दे दूँगी।
              शिप्रा का ऐसा विद्रूप रूप को मैं पहली बार देख रही थी। उसके इस व्यवहार से मैं पूरी तरह से टूट गई। लगा अब जाना भी चाहूँ तो नहीं जा पाऊँगी। पल भर में मेरी टाँगें और पाँव बिल्कुल बेजान हो आये। अब तो एक कदम भी नहीं चल पाऊँगी मैं।
              मेरी पूरी रात आँखों में कटी थी। मैंने रात भर में यह निर्णय ले लिया था कि सुबह उठते ही दो काम करूँगी। एक तो देव को फोन पर स्पष्ट कह दूँगी कि मैं नौकरी छोड़ रही हूँ। दूसरे डायरैक्टर साहब को फोन पर ही इतला दे दूँगी कि मैं रेज़गनेशन लैटर भेज रही हूँ।
          लेकिन मेरे सुबह उठने से पहले दरवाज़े पर कॉल-बेल हुई तो मैंने उनींदी आँखों से दरवाज़ा खोला था।  दरवाज़ा खोलते ही मैं हतप्रभ रह गई। सामने देव खड़े थे।
          -आप! मैं चौंकती सी बोली थी।
          -मेरे आने पर इतना चौंकने वाली क्या बात है?
          -नहीं ऐसा नहीं है। मैं झेंपती हुई बोली थी। आप तो पन्द्रह तारीख को आने वाले थे।          -हाँ! सोचा दो दिन तुम्हारे साथ और रह लूँगा। तुम्हें सौलह तारीख सुबह ही तो जाना है।
          -अब केवल दो दिन और नहीं। तुम चाहो तो अब सारी उम्र मेरे साथ रह सकते हो। मुझे इनकी बात से बात करने का मौका मिल गया था।
          -क्या मतलब? देव का चौंकना स्वाभाविक था। अरे अन्दर तो आओ।  मैं भी क्या सुबह-सुबह ले बैठी। आप बाथरूम में चल कर ब्रश कीजिए मैं चाय लेकर आती हूँ।

            बैग ड्राईंगरूम में ही रख ये टॉयलट की ओर बढ़ गए। फ्रेश हो कर लौटे तो मैं डाईनिंग पर चाय के इन्तज़ार में बैठी थी। इनका चेहरा देख मैं हैरान थी। मेरी इतनी बड़ी बात के बावजूद इनके चेहरे पर कोई उत्सुकता नहीं। वैसे यह कोई नई या बड़ी बात नहीं थी मेरे लिये। अक्सर ऐसा होता आया है। मेरी पहाड़ जैसी समस्याओं को सुनकर भी इन्होंने ठहाके लगाये हैं- बस इतनी सी बात थी! इनका पैट वाक्या है यह। मुझे सन्नाटे में देख कह उठते हैं- छोटी-छोटी बातों पर चेहरा ऐसे बना लेती हो जैसे मुर्दाघाट से लौटी हो। मैं अक्सर इन बातों से टूटी हूँ। आँखों से नहीं तो दिल से रोयी हूँ। अगर मेरी वे समस्याएँ इस आदमी के लिये छोटी थीं तो उनमें भी इसने कौन सा साथ दिया मेरा। मैं स्वयं ही उनसे लड़ती रही।
           ये चुपचाप चाय सिप किये जा रहे थे। में अपने द्वन्द्व को झेलती भूल ही गयी कि मेरे आगे चाय का कप रखा है।
          -चाय बहुत गर्म है क्या? इन्होंने कहा तो मैं जैसे धरातल पर गिरी- नहीं तो!
          -बच्चे कब उठते हैं? चाय खतम हो गई तो इन्होंने पूछा।
          -आजकल मस्ती में हैं। आठ बाजे के बाद ही उठते हैं। आज तुम जाकर उठा लो न।
           -मैं जानता था तुम्हारे होते ये इसी तरह बिगड़ेंगे। देव बेड़रूम की ओर बढ़ते हुए बोले।            यह वाक्य मज़ाक में कहा गया है या फिर सच में मुझ पर आरोप लगाया जा रहा है मैं बात को पूरी तरह से पकड़ नहीं पायी थी।
           कमरे में पहुँच ये अर्शी के साथ बैड पर बैठ गए । मैं शिप्रा के बालों पर हाथ फेरती बोली- देखो बेटे पापा आए हैं।
           बच्चे गहरी नींद में थे। मैं शिप्रा से नज़र हटा इनसे मुखातिब हुई- शिप्रा कुछ परेशान है।
           -क्यों?
           -भैया-भाभी इन्हें कुछ निगलैक्ट कर रहे हैं।
           -मतलब?
           -कल ही दोनों बता रहे थे कि भाभी कई बार इन्हें शर्मा अंकल के यहाँ छोड़ कर चले जाती है।
           -जब बच्चे तुम्हारे साथ थे तो तुम कितने घंटे उन्हें पड़ौसियों के यहाँ छोड़ शॉपिंग के लिये जाती थी याद है तुम्हे?
            इनके दो टूक जवाब ने पलभर के लिए मुझे पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया। लेकिन अगले ही पल मैं सीधे ही विषय पर आ गई थी- देव मैं नौकरी छोड़ रही हूँ। शिप्रा अब बड़ी हो रही है मैं उसे अकेला नहीं छोड़ना चाहती।
           -तुम नौकरी छोड़ रही हो! देव ने एक-एक शब्द को चबाते हुए जिस हेय दृष्टि से मेरी ओर देखा मैं बुरी तरह से आतंकित हो आई थी। ये उसी रौ में बोले- मैं जानता हूँ तुमने कभी दिमाग से काम नहीं लिया वरना इतनी घटिया बात कभी न करती। तुम मेरी कमाई पर ऐश करना चाहती हो या फिर तुम्हे अपने ही माँ-बाप  भाई-बहन पर सन्देह होने लगा है। केवल मेरी तनख्वाह पर कितना बना लोगी? बच्चों की पढ़ाई बच्चों का भविष्य उसकी कोई परवाह है तुम्हे!
           बच्चों का भविष्य! मेरा मन चीत्कार उठा। बच्चों का वर्तमान ही नहीं है तो फिर उनका भविष्य क्या होगा? राघव और शर्मा जैसे कई चहरे मेरे सामने अट्टहास कर उठे थे लेकिन मैं समझ गई थी देव मेरी बात को कभी स्वीकार नहीं करेंगे। अर्थ उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण है। मेरे एक शब्द और पर वे मुझे जलालत की गर्त में फैंक देंगे। तब नहीं सह पाऊंगी मैं। मुझे वापिस जाना पड़ेगा। यह व्यक्ति जो मेरा पति होने का दम्भ भरता है मेरे ऊपर अपनी कमाई का एक पैसा लगा पाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।
           मुझे लगा था शिप्रा की उस टूटी हुई गुल्लक की तरह मैं भी टूटकर पूरी तरह से बिखर चुकी हूँ । अब मैं न उनका वर्तमान समेट सकती हूँ न उनका भविष्य।

Source : http://www.aparajita.org/read_more.php?id=182&position=4&day=7

Wednesday, October 19, 2011

जीवन की सार्थकता

एक राजा काफी वृद्ध और बीमार हो चला था। उसका जीवन दवाओं के सहारे ही चल रहा था। इस दौरान एक ज्योतिषी उसके पास आया और उसने कहा कि राजा का जीवन बस एक माह शेष है। इससे राजा और चिंतित हो गया। उसकी बीमारी और बढ़ गई। उन्हीं दिनों एक संत राजा को देखने आए। राजा ने उन्हें सारी बात बताई तो वे हंसकर बोले, 'आप तो अमर हैं।' इस पर राजा को बेहद आश्चर्य हुआ। उसने संत से कहा, 'मेरा शरीर तो जर्जर हो चुका है। यह कभी भी टूट सकता है फिर मैं अमर कैसे हो सकता हूं। कृपया विस्तार से समझाएं।'

यह सुनकर संत राजा को एक जुलाहे के यहां ले गए। संत ने जुलाहे से पूछा, 'तुम कपड़ा तो बनाते हो पर बेचारी रूई के अस्तित्व को क्यों मिटाते हो?' इस पर जुलाहा बोला, 'यदि समय रहते रूई का उपयोग न किया जाए तो वायु और रेत इसको नष्ट कर देंगी। मैं तो इन्हें कपड़े में बदल इन्हें समाज के लिए उपयोगी बना रहा हूं।' अब संत ने राजा को समझाया, 'राजन्, दुनिया की हर वस्तु का एक न एक दिन मिटना तय है। 

इसलिए उनका सर्वोत्तम प्रयोग किया जाना चाहिए। इसी में उसकी सार्थकता है। शरीर का भी एक दिन नष्ट होना तय है। उसे स्थायी रूप से बचाया नहीं जा सकता। इसलिए उसके बचने की चिंता छोड़कर हमें उसका दूसरों के हित में प्रयोग करना चाहिए।' राजा संत का आशय समझ गया। वह मृत्यु की चिंता छोड़कर राजकाज में फिर से मन लगाने लगा। धीरे-धीरे वह स्वस्थ हो गया।
संकलन: नरेंद्र वार्ष्णेय

साभार दैनिक नव भारत टाइम्स :  http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/10403461.cms

Monday, August 29, 2011

दस दिन का अनशन - हरिशंकर परसाई

हरिशंकर परसाई की यह रचना रोचक है और आज के संदर्भों से जुड़ी है। इन दिनों नेट पर पढ़ी जा रही है। आपने पढ़ी न हो तो पढ़ लें। इसे मैने  एक जिद्दी धुन  नाम के ब्लॉग से लिया है।


10 जनवरी

आज मैंने बन्नू से कहा, " देख बन्नू, दौर ऐसा आ गया है कि संसद, क़ानून, संविधान, न्यायालय सब बेकार हो गए हैं. बड़ी-बड़ी मांगें अनशन और आत्मदाह की धमकी से पूरी हो रही हैं. २० साल का प्रजातंत्र ऐसा पक गया है कि एक आदमी के मर जाने या भूखा रह जाने की धमकी से ५० करोड़ आदमियों के भाग्य का फैसला हो रहा है. इस वक़्त तू भी उस औरत के लिए अनशन कर डाल."

बन्नू सोचने लगा. वह राधिका बाबू की बीवी सावित्री के पीछे सालों से पड़ा है. भगाने की कोशिश में एक बार पिट भी चुका है. तलाक दिलवाकर उसे घर में डाल नहीं सकता, क्योंकि सावित्री बन्नू से नफरत करती है.

सोचकर बोला, " मगर इसके लिए अनशन हो भी सकता है? "

मैंने कहा, " इस वक़्त हर बात के लिए हो सकता है. अभी बाबा सनकीदास ने अनशन करके क़ानून बनवा दिया है कि हर आदमी जटा रखेगा और उसे कभी धोएगा नहीं. तमाम सिरों से दुर्गन्ध निकल रही है. तेरी मांग तो बहुत छोटी है- सिर्फ एक औरत के लिए."

सुरेन्द्र वहां बैठा था. बोला, " यार कैसी बात करते हो! किसी की बीवी को हड़पने के लिए अनशन होगा? हमें कुछ शर्म तो आनी चाहिए. लोग हँसेंगे."

मैंने कहा, " अरे यार, शर्म तो बड़े-बड़े अनशनिया साधु-संतों को नहीं आई. हम तो मामूली आदमी हैं. जहाँ तक हंसने का सवाल है, गोरक्षा आन्दोलन पर सारी दुनिया के लोग इतना हंस चुके हैं कि उनका पेट दुखने लगा है. अब कम-से-कम दस सालों तक कोई आदमी हंस नहीं सकता. जो हंसेगा वो पेट के दर्द से मर जाएगा."

बन्नू ने कहा," सफलता मिल जायेगी?"

मैंने कहा," यह तो 'इशू' बनाने पर है. अच्छा बन गया तो औरत मिल जाएगी. चल, हम 'एक्सपर्ट' के पास चलकर सलाह लेते हैं. बाबा सनकीदास विशेषज्ञ हैं. उनकी अच्छी 'प्रैक्टिस' चल रही है. उनके निर्देशन में इस वक़्त चार आदमी अनशन कर रहे हैं."

हम बाबा सनकीदास के पास गए. पूरा मामला सुनकर उन्होंने कहा," ठीक है. मैं इस मामले को हाथ में ले सकता हूँ. जैसा कहूँ वैसा करते जाना. तू आत्मदाह की धमकी दे सकता है?"

बन्नू कांप गया. बोला," मुझे डर लगता है."

"जलना नहीं है रे. सिर्फ धमकी देना है."

"मुझे तो उसके नाम से भी डर लगता है."

बाबा ने कहा," अच्छा तो फिर अनशन कर डाल. 'इशू' हम बनायेंगे."

बन्नू फिर डरा. बोला," मर तो नहीं जाऊँगा."

बाबा ने कहा," चतुर खिलाड़ी नहीं मरते. वे एक आँख मेडिकल रिपोर्ट पर और दूसरी मध्यस्थ पर रखते हैं. तुम चिंता मत करो. तुम्हें बचा लेंगे और वह औरत भी दिला देंगे."


11 जनवरी

आज बन्नू आमरण अनशन पर बैठ गया. तम्बू में धुप-दीप जल रहे हैं. एक पार्टी भजन गा रही है - 'सबको
सन्मति दे भगवान्!'. पहले ही दिन पवित्र वातावरण बन गया है. बाबा सनकीदास इस कला के बड़े उस्ताद हैं. उन्होंने बन्नू के नाम से जो वक्तव्य छपा कर बंटवाया है, वो बड़ा ज़ोरदार है. उसमें बन्नू ने कहा है कि 'मेरी आत्मा से पुकार उठ रही है कि मैं अधूरी हूँ. मेरा दूसरा खंड सावित्री में है. दोनों आत्म-खण्डों को मिलाकर एक करो या मुझे भी शरीर से मुक्त करो. मैं आत्म-खण्डों को मिलाने के लिए आमरण अनशन पर बैठा हूँ. मेरी मांग है कि सावित्री मुझे मिले. यदि नहीं मिलती तो मैं अनशन से इस आत्म-खंड को अपनी नश्वर देह से मुक्त कर दूंगा. मैं सत्य पर हूँ, इसलिए निडर हूँ. सत्य की जय हो!'

सावित्री गुस्से से भरी हुई आई थी. बाबा सनकीदास से कहा," यह हरामजादा मेरे लिए अनशन पर बैठा है ना?"
बाबा बोले," देवी, उसे अपशब्द मत कहो. वह पवित्र अनशन पर बैठा है. पहले हरामजादा रहा होगा. अब नहीं रहा. वह अनशन कर रहा है."

सावित्री ने कहा," मगर मुझे तो पूछा होता. मैं तो इस पर थूकती हूँ."

बाबा ने शान्ति से कहा," देवी, तू तो 'इशू' है. 'इशू' से थोड़े ही पूछा जाता है. गोरक्षा आन्दोलन वालों ने गाय से कहाँ पूछा था कि तेरी रक्षा के लिए आन्दोलन करें या नहीं. देवी, तू जा. मेरी सलाह है कि अब तुम या तुम्हारा पति यहाँ न आएं. एक-दो दिन में जनमत बन जाएगा और तब तुम्हारे अपशब्द जनता बर्दाश्त नहीं करेगी."
वह बड़बड़ाती हुई चली गई.

बन्नू उदास हो गया. बाबा ने समझाया," चिंता मत करो. जीत तुम्हारी होगी. अंत में सत्य की ही जीत होती है."


13 जनवरी

बन्नू भूख का बड़ा कच्चा है. आज तीसरे ही दिन कराहने लगा. बन्नू पूछता है, " जयप्रकाश नारायण आये?"
मैंने कहा," वे पांचवें या छठे दिन आते हैं. उनका नियम है. उन्हें सूचना दे दी है."

वह पूछता है," विनोबा ने क्या कहा है इस विषय में?"

बाबा बोले," उन्होंने साधन और साध्य की मीमांसा की है, पर थोड़ा तोड़कर उनकी बात को अपने पक्ष में उपयोग किया जा सकता है."

बन्नू ने आँखें बंद कर लीं. बोला,"भैया, जयप्रकाश बाबू को जल्दी बुलाओ."

आज पत्रकार भी आये थे. बड़ी दिमाग-पच्ची करते रहे.

पूछने लगे," उपवास का हेतु कैसा है? क्या वह सार्वजनिक हित में है? "

बाबा ने कहा," हेतु अब नहीं देखा जाता. अब तो इसके प्राण बचाने की समस्या है. अनशन पर बैठना इतना बड़ा आत्म-बलिदान है कि हेतु भी पवित्र हो जाता है."

मैंने कहा," और सार्वजनिक हित इससे होगा. कितने ही लोग दूसरे की बीवी छीनना चाहते हैं, मगर तरकीब उन्हें नहीं मालूम. अनशन अगर सफल हो गया, तो जनता का मार्गदर्शन करेगा."


14 जनवरी

बन्नू और कमज़ोर हो गया है. वह अनशन तोड़ने की धमकी हम लोगों को देने लगा है. इससे हम लोगों का मुंह काला हो जायेगा. बाबा सनकीदास ने उसे बहुत समझाया.

आज बाबा ने एक और कमाल कर दिया. किसी स्वामी रसानंद का वक्तव्य अख़बारों में छपवाया है. स्वामीजी ने कहा है कि मुझे तपस्या के कारण भूत और भविष्य दिखता है. मैंने पता लगाया है क बन्नू पूर्वजन्म में ऋषि था और सावित्री ऋषि की धर्मपत्नी. बन्नू का नाम उस जन्म में ऋषि वनमानुस था. उसने तीन हज़ार वर्षों के बाद अब फिर नरदेह धारण की है. सावित्री का इससे जन्म-जन्मान्तर का सम्बन्ध है. यह घोर अधर्म है कि एक ऋषि की पत्नी को राधिका प्रसाद-जैसा साधारण आदमी अपने घर में रखे. समस्त धर्मप्राण जनता से मेरा आग्रह है कि इस अधर्म को न होने दें.

इस वक्तव्य का अच्छा असर हुआ. कुछ लोग 'धर्म की जय हो!' नारे लगाते पाए गए. एक भीड़ राधिका बाबू के घर के सामने नारे लगा रही थी----

"राधिका प्रसाद-- पापी है! पापी का नाश हो! धर्म की जय हो."

स्वामीजी ने मंदिरों में बन्नू की प्राण-रक्षा के लिए प्रार्थना का आयोजन करा दिया है.


15 जनवरी

रात को राधिका बाबू के घर पर पत्थर फेंके गए.

जनमत बन गया है.

स्त्री-पुरुषों के मुख से यह वाक्य हमारे एजेंटों ने सुने---
"बेचारे को पांच दिन हो गए. भूखा पड़ा है."

"धन्य है इस निष्ठां को."

"मगर उस कठकरेजी का कलेजा नहीं पिघला."

"उसका मरद भी कैसा बेशरम है."

"सुना है पिछले जन्म में कोई ऋषि था."

"स्वामी रसानंद का वक्तव्य नहीं पढ़ा!"

"बड़ा पाप है ऋषि की धर्मपत्नी को घर में डाले रखना."

आज ग्यारह सौभाग्यवतियों ने बन्नू को तिलक किया और आरती उतारी.

बन्नू बहुत खुश हुआ. सौभाग्यवतियों को देख कर उसका जी उछलने लगता है.

अखबार अनशन के समाचारों से भरे हैं.

आज एक भीड़ हमने प्रधानमन्त्री के बंगले पर हस्तक्षेप की मांग करने और बन्नू के प्राण बचाने की अपील करने भेजी थी. प्रधानमन्त्री ने मिलने से इनकार कर दिया.

देखते हैं कब तक नहीं मिलते.

शाम को जयप्रकाश नारायण आ गए. नाराज़ थे. कहने लगे," किस-किस के प्राण बचाऊं मैं? मेरा क्या यही धंधा है? रोज़ कोई अनशन पर बैठ जाता है और चिल्लाता है प्राण बचाओ. प्राण बचाना है तो खाना क्यों नहीं लेता? प्राण बचाने के लिए मध्यस्थ की कहाँ ज़रुरत है? यह भी कोई बात है! दूसरे की बीवी छीनने के लिए अनशन के पवित्र अस्त्र का उपयोग किया जाने लगा है."

हमने समझाया," यह 'इशू' ज़रा दूसरे किस्म है. आत्मा से पुकार उठी थी."

वे शांत हुए. बोले," अगर आत्मा की बात है तो मैं इसमें हाथ डालूँगा."

मैंने कहा," फिर कोटि-कोटि धर्मप्राण जनता की भावना इसके साथ जुड़ गई है."

जयप्रकाश बाबू मध्यस्थता करने को राज़ी हो गए. वे सावित्री और उसके पति से मिलकर फिर प्रधानमन्त्री से मिलेंगे.

बन्नू बड़े दीनभाव जयप्रकाश बाबू की तरफ देख रहा था.

बाद में हमने उससे कहा," अबे साले, इस तरह दीनता से मत देखा कर. तेरी कमज़ोरी ताड़ लेगा तो कोई भी नेता तुझे मुसम्मी का रस पिला देगा. देखता नहीं है, कितने ही नेता झोलों में मुसम्मी रखे तम्बू के आस-पास घूम रहे हैं."


16 जनवरी

जयप्रकाश बाबू की 'मिशन' फेल हो गई. कोई मानने को तैयार नहीं है. प्रधानमन्त्री ने कहा," हमारी बन्नू के साथ सहानुभूति है, पर हम कुछ नहीं कर सकते. उससे उपवास तुडवाओ, तब शान्ति से वार्ता द्वारा समस्या का हल ढूँढा जाएगा."

हम निराश हुए. बाबा सनकीदास निराश नहीं हुए. उन्होंने कहा," पहले सब मांग को नामंज़ूर करते हैं. यही प्रथा है. अब आन्दोलन तीव्र करो. अखबारों में छपवाओ क बन्नू की पेशाब में काफी 'एसीटोन' आने लगा है. उसकी हालत चिंताजनक है. वक्तव्य छपवाओ कि हर कीमत पर बन्नू के प्राण बचाए जाएँ. सरकार बैठी-बैठी क्या देख रही है? उसे तुरंत कोई कदम उठाना चाहिए जिससे बन्नू के बहुमूल्य प्राण बचाए जा सकें."

बाबा अद्भुत आदमी हैं. कितनी तरकीबें उनके दिमाग में हैं. कहते हैं, "अब आन्दोलन में जातिवाद का पुट देने का मौका आ गया है. बन्नू ब्राम्हण है और राधिकाप्रसाद कायस्थ. ब्राम्हणों को भड़काओ और इधर कायस्थों को. ब्राम्हण-सभा का मंत्री आगामी चुनाव में खड़ा होगा. उससे कहो कि यही मौका है ब्राम्हणों के वोट इकट्ठे ले लेने का."

आज राधिका बाबू की तरफ से प्रस्ताव आया था कि बन्नू सावित्री से राखी बंधवा ले.

हमने नामंजूर कर दिया.


17 जनवरी

आज के अखबारों में ये शीर्षक हैं---
"बन्नू के प्राण बचाओ!

बन्नू की हालत चिंताजनक!'

मंदिरों में प्राण-रक्षा के लिए प्रार्थना!"

एक अख़बार में हमने विज्ञापन रेट पर यह भी छपवा लिया---
"कोटि-कोटि धर्म-प्राण जनता की मांग---!
बन्नू की प्राण-रक्षा की जाए!
बन्नू की मृत्यु के भयंकर परिणाम होंगे !"

ब्राह्मण-सभा के मंत्री का वक्तव्य छप गया. उन्होंने ब्राह्मण जाति की इज्ज़त का मामला इसे बना लिया था. सीधी कार्यवाही की धमकी दी थी.

हमने चार गुंडों को कायस्थों के घरों पर पत्थर फेंकने के लिए तय कर किया है.

इससे निपटकर वही लोग ब्राह्मणों के घर पर पत्थर फेंकेंगे.

पैसे बन्नू ने पेशगी दे दिए हैं.

बाबा का कहना है क कल या परसों तक कर्फ्य लगवा दिया जाना चाहिए. दफा 144 तो लग ही जाये. इससे 'केस' मज़बूत होगा.


18 जनवरी

रात को ब्राह्मणों और कायस्थों के घरों पर पत्थर फिंक गए.

सुबह ब्राह्मणों और कायस्थों के दो दलों में जमकर पथराव हुआ.

शहर में दफा 144 लग गयी.

सनसनी फैली हुई है.

हमारा प्रतिनिधि मंडल प्रधानमन्त्री से मिला था. उन्होंने कहा," इसमें कानूनी अडचनें हैं. विवाह-क़ानून में संशोधन करना पड़ेगा."

हमने कहा," तो संशोधन कर दीजिये. अध्यादेश जारी करवा दीजिये. अगर बन्नू मर गया तो सारे देश में आग लग जायेगी."

वे कहने लगे," पहले अनशन तुडवाओ ? "

हमने कहा," सरकार सैद्धांतिक रूप से मांग को स्वीकार कर ले और एक कमिटी बिठा दे, जो रास्ता बताये कि वह औरत इसे कैसे मिल सकती है."

सरकार अभी स्थिति को देख रही है. बन्नू को और कष्ट भोगना होगा.

मामला जहाँ का तहाँ रहा. वार्ता में 'डेडलॉक' आ गया है.

छुटपुट झगड़े हो रहे हैं.

रात को हमने पुलिस चौकी पर पत्थर फिंकवा दिए. इसका अच्छा असर हुआ.

'प्राण बचाओ'---की मांग आज और बढ़ गयी.


19 जनवरी

बन्नू बहुत कमज़ोर हो गया है. घबड़ाता है. कहीं मर न जाए.

बकने लगा है कि हम लोगों ने उसे फंसा दिया है. कहीं वक्तव्य दे दिया तो हम लोग 'एक्सपोज़' हो जायेंगे.

कुछ जल्दी ही करना पड़ेगा. हमने उससे कहा कि अब अगर वह यों ही अनशन तोड़ देगा तो जनता उसे मार डालेगी.

प्रतिनिधि मंडल फिर मिलने जाएगा.


20 जनवरी

'डेडलॉक '

सिर्फ एक बस जलाई जा सकी.

बन्नू अब संभल नहीं रहा है.

उसकी तरफ से हम ही कह रहे हैं कि "वह मर जाएगा, पर झुकेगा नहीं!"

सरकार भी घबराई मालूम होती है.

साधुसंघ ने आज मांग का समर्थन कर दिया.

ब्राह्मण समाज ने अल्टीमेटम दे दिया. १० ब्राह्मण आत्मदाह करेंगे.

सावित्री ने आत्महत्या की कोशिश की थी, पर बचा ली गयी.

बन्नू के दर्शन के लिए लाइन लगी रही है.

राष्ट्रसंघ के महामंत्री को आज तार कर दिया गया.

जगह-जगह- प्रार्थना-सभाएं होती रहीं.

डॉ. लोहिया ने कहा है क जब तक यह सरकार है, तब तक न्यायोचित मांगें पूरी नहीं होंगी. बन्नू को चाहिए कि वह सावित्री के बदले इस सरकार को ही भगा ले जाए.


21 जनवरी

बन्नू की मांग सिद्धांततः स्वीकार कर ली गयी.

व्यावहारिक समस्याओं को सुलझाने के लिए एक कमेटी बना दी गई है.

भजन और प्रार्थना के बीच बाबा सनकीदास ने बन्नू को रस पिलाया. नेताओं की मुसम्मियाँ झोलों में ही सूख गईं. बाबा ने कहा कि जनतंत्र में जनभावना का आदर होना चाहिए. इस प्रश्न के साथ कोटि-कोटि जनों की भावनाएं जुड़ी हुई थीं. अच्छा ही हुआ जो शान्ति से समस्या सुलझ गई, वर्ना हिंसक क्रान्ति हो जाती.

ब्राह्मणसभा के विधानसभाई उमीदवार ने बन्नू से अपना प्रचार कराने के लिए सौदा कर लिया है. काफी बड़ी रकम दी है. बन्नू की कीमत बढ़ गयी.

चरण छूते हुए नर-नारियों से बन्नू कहता है," सब ईश्वर की इच्छा से हुआ. मैं तो उसका माध्यम हूँ."

नारे लग रहे हैं -- सत्य की जय! धर्म की जय!

Source : http://pramathesh.blogspot.com/2011/08/blog-post_1980.html#comment-form

Sunday, August 28, 2011

चूहों से परेशान तेनालीराम


तेनाली राम के बारे में

(1520 ई. में दक्षिण भारत के विजयनगर राज्य में राजा कृष्णदेव राय हुआ करते थे। तेनाली राम उनके दरबार में अपने हास-परिहास से लोगों का मनोरंजन किया करते थे। उनकी खासियत थी कि गम्भीर से गम्भीर विषय को भी वह हंसते-हंसते हल कर देते थे।

उनका जन्म गुंटूर जिले के गलीपाडु नामक कस्बे में हुआ था। तेनाली राम के पिता बचपन में ही गुजर गए थे। बचपन में उनका नाम ‘राम लिंग’ था, चूंकि उनकी परवरिश अपने ननिहाल ‘तेनाली’ में हुई थी, इसलिए बाद में लोग उन्हें तेनाली राम के नाम से पुकारने लगे।

विजयनगर के राजा के पास नौकरी पाने के लिए उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा। कई बार उन्हें और उनके परिवार को भूखा भी रहना पड़ा, पर उन्होंने हार नहीं मानी और कृष्णदेव राय के पास नौकरी पा ही ली। तेनाली राम की गिनती राजा कृष्णदेव राय के आठ दिग्गजों में होती है।)

चूहों की समस्या


चूहों ने तेनाली राम के घर में बड़ा उत्पात मचा रखा था। एक दिन चूहों ने तेनालीराम की पत्नी की एक सुंदर साड़ी में काटकर एक छेद बना दिया। तेनाली राम और उनकी पत्नी को बहुत क्रोध आया। उन्होंने सोचा-“इन्हें पकड़कर मारना ही पड़ेगा। नहीं तो न जाने ओर कितना नुकसान कर दें।”
बहुत कोशिश करने पर भी चूहे उनके हाथ नहीं लग रहे थे। वे संदूकों और दूसरे सामान के पीछे जाकर छिप जाते। भागते-दौड़ते, घंटों की कोशिश के बाद कहीं एक चूहा पकड़कर मार पाए। तेनाली राम बड़ा परेशान था।

आखिर वह अपने एक मित्र के पास गया, जिसने उसे सलाह दी कि चूहों से छुटकारा पाने के लिए एक बिल्ली पाल लो। वही इस मुसीबत का इलाज है। तेनाली राम ने बिल्ली पाल ली और सचमुच उसके यहां चूहों का उत्पात कम होने लगा। उसने चैन की सांस ली।

अचानक एक दिन उसकी बिल्ली ने पड़ोसियों के पालतू तोते को पकड़ लिया और मार डाला। घर की मालकिन ने अपने पति से शिकायत की और कहा कि इस दुष्ट बिल्ली को मार डालो। उसने तेनाली राम की बिल्ली का पीछा किया और उसे जा पकड़ा। वह उसको मारने ही वाला था कि तेनाली राम वहां आ गया।

तेनाली ने कहा-“भाई, मैंने यह बिल्ली चूहों से छुटाकारा पाने के लिए पाली है। हमें क्षमा कर दीजिए और बिल्ली मुझे वापस कर दीजिए। मुझ पर आपका बड़ा एहसान होगा।” पड़ौसी नहीं माना, बोला-“चूहे पकड़ने के लिए तुम्हें बिल्ली की क्या आवश्यकता है? मैं तो बिना बिल्ली के भी चूहे पकड़ सकता हूं।” और उसने बिल्ली को मार दिया।

कुछ दिनों बाद पड़ोसी को किसी ने एक सुन्दर संदूक उपहार भेजा। उसने अपने शयनकक्ष में जाकर संदूक खोला। उसी कमरे में उसकी पत्नी की कीमती साड़ियां रखी थीं। संदूक खोलते ही चूहों की सेना उसमें से उछलकर बाहर निकल आई। चूहे कमरे के चारों और दौड़ने लगे। वह उन्हें पकड़ने के लिए कभी बाएं तो कभी दाएं उछ्लता पर असफल रहा। उसके साथ उसके नौकर भी थे।

कई घंटों की उछलकूद के बाद कहीं जाकर उन्हें चूहों से छुटकारा मिला। पर इस दौरान उनका काफी नुकसान भी उठाना पड़ा। उनके कीमती गलीचों पर चूहों के खून के निशान पड़ चुके थे। ठोकर खाकर एक कीमती फूलदान भी टूट गया गया। 

थके हारे पड़ोसी ने जब संदूक में यह देखने का प्रयास किया कि आखिर किसने यह संदूक भेजी है, तो एक पर्ची पाई। उस पर लिखा था, “आपने कहा था कि आप बिना बिल्ली के ही चूहों पर काबू पा जाएंगे।

मैं परीक्षा के लिए कुछ चूहों को आपके यहां भेज रहा हूं। आपका तेनालीराम।” तेनालीराम का नाम पढ़ते ही पड़ोसी को सारी बात समझ में आ गई। उसने फौरन अपनी भूल के लिए तेनालीराम से माफी मांग ली।
Source : http://josh18.in.com/showstory.php?id=803872

महंगाई के चूहे -रश्मि गौड़

अभी कुछ दिन पहले लालाजी ने अपने ऊपर का मकान पाटिल साहब को लीज पर दिया था। पाटिल साहब किसी कंपनी में प्रबंध निदेशक थे। भारी किराया अदा करती थी उनकी कंपनी। पाटिल साहब का क्या कहना, गजब का रोब-दाब, शोफर ड्रिवन गाड़ी आती थी उन्हें लेने, चकाचक यूनिफॉर्म में जब शोफर तपाक से गाड़ी का दरवाजा खोलता तो पूरी कॉलोनी के लोग देखते रह जाते।
उस कॉलोनी में अधिकतर निवासी व्यवसायरत थे। उनके बाप-दादे ही ये कोठियां और व्यवसाय विरासत में दे गए थे। किसी की चांदी की दुकान थी, किसी की कपड़े की, तो कोई टेंट की दसियों दुकानें लिए बैठा था। आज तक इस कॉलोनी में कोई भी असली पढ़ा-लिखा नहीं आया था। यूं तो इंटर और मैट्रिक पास कई नौजवान थे, परंतु सभी ने अपने स्कूल लड़खड़ाते हुए पास किए थे। घर में कोई कमी नहीं थी, सो कोई बड़े भाई के साथ लग गया तो कोई पिता का हाथ बंटाने लगा, लाखों के वारे-न्यारे होने लगे, बिजनेस के गुर सीखने व सिखाने में जिंदगी शांति से बीत रही थी कि पाटिल साहब के आने पर मानो तेज हवाएं चलने लगीं। जनाब पाटिल साहब व उनकी पत्नी, जो कि किसी कॉलेज में प्राध्यापिका थीं, की चर्चा घर-घर होने लगी। ज्यों-ज्यों लोग-बाग उनके ठाट-बाट देखते, त्यों-त्यों उनका मन मेलजोल बढ़ाने को करता, पर पाटिल साहब व उनकी पत्नी किसी की ओर देखते भी न थे, धड़ाधड़ सीढ़ियों से नीचे उतरते और गाड़ी में बैठ कर ओझल। अंग्रेजी तो मानो उनकी मातृभाषा थी। लालाजी से भी बस दुआ-सलाम ही थी। घर में एक वृद्धा नौकरानी थी, जो बस सब्जी आदि लेने नीचे उतरती, पर बोलती किसी से भी नहीं थी। बस पाटिल दंपत्ति के जाने के बाद बालकनी में बैठती और सड़क पर आते-जाते लोगों को देखती रहती या सिलाई-बुनाई करती रहती। पाटिल दंपत्ति के आने पर खिड़की बंद हो जाती। ऐसे में भला कॉलोनी की महिलाओं में गजब की बेचैनी हो गई। किटी पार्टीज व ताश पार्टियों में उनकी चर्चा होने लगी। एक दिन मिसेज शर्मा मिसेज खन्ना से बोलीं, ‘अरे, इन मेम साहब को भी मेंबर बनाओ अपने क्लब का।’ ‘हुंह, इनके तो मिजाज ही नहीं मिलते, मेम साब होंगी तो अपने घर की। जितना ये दोनों मिया-बीवी मिल कर कमाते होंगे, उतना तो खन्ना साहब एक दिन में कमा लेते होंगे।’ मिसेज खन्ना ने खिन्न होकर कहा।
‘और क्या, वो मेंबर बनना तो दूर, किसी की ओर देखती तक नहीं।’ मिसेज सिंह को अपना डायमंड सेट पहनना व्यर्थ ही लग रहा था। उधर, लालाजी की ललाइन बड़ी दु:खी थीं। शेयर दलाल लालाजी रोज आकर हजारों रुपए की थैली उनके हाथ में पकड़ाते तो ललाइन की बड़ी इच्छा होती कि ऊपरवाली मेम साब भी देख लें एक नजर, पर उस किले से किसी को देखना तो दूर, एक आवाज भी सुनाई न देती। खैर, इसी प्रकार छह महीने बीत गए, पाटिल साहब से किसी का भी परिचय न हो सका। लालाजी के हाथ में हर पहली तारीख को किराए का चेक आ ही जाता था, सो समझ में ही न आ रहा था कि पहल कैसे की जाए। अचानक एक दिन मानों बिल्ली के भागों छींका टूट गया। पोस्टमैन एक तार लाया, जिसे लालाजी ने पाटिल दंपती के घर पर न होने की वजह से रिसीव कर लिया। जब पाटिल साहब घर पहुंचे तो लालाजी ने उन्हें नीचे नहीं रोका, बल्कि ऊपर जाने दिया, फिर थोड़ी देर बाद ऊपर पहुंच कर घंटी बजाई। पाटिल साहब की वृद्धा नौकरानी ने दरवाजा खोला तो लालाजी बोले, ‘पाटिल साहब से ही काम है, उन्हें बुला दीजिए।’ ‘आप थोड़ा बैठिए, साहब जरा बाथरूम में हैं।’ नौकरानी अंदर चली गई। लालाजी लपक कर ड्राइंग-रूम में जा बैठे। चारों ओर चौकन्नी नजरों से देखने लगे। उन्हें यह देख कर बड़ी हैरत हुई कि इतने बड़े साहब का ड्राइंग-रूम बड़ा ही साधारण था, न ढंग का सोफासेट, खिड़की-दरवाजों पर मामूली परदे, हालांकि रूम सुरुचिपूर्ण सजा था, परंतु ढंग का कोई सामान ड्राइंग-रूम में नहीं था। इतने में पाटिल साहब आ पहुंचे, नमस्ते का जवाब देते हुए आने का मकसद पूछा। जवाब में लालाजी ने वह तार पकड़ा दिया।
टेलीग्राम पढ़ कर पाटिल साहब कुछ गमगीन-से हो गए। लालाजी ने पूछा ‘क्या बात है जी, सब कुशल तो है न?’ उनकी आवाज में अपनेपन का आभास पाकर पाटिल साहब से भी न रहा गया, बोले, ‘मेरी दो बेटियां वैलहैम्स कॉलेज में देहरादून में पढ़ती हैं, पहाड़ों पर ऐजीटेशन चल रहा है, इसलिए वहां से तार आया है कि आकर बच्चों को ले जाएं।’ ‘तो की गल है जी, तुसी जाकर हुणे ही ले आओ। हम आपके घर को देख लेंगे।’ लालाजी ने फौरन मदद का हाथ बढ़ाया। ‘घर की चिंता नहीं ब्रदर, पर ये देहरादून आना-जाना हमारे बजट में नहीं था। अब दो-तीन हजार रुपए यूं ही खर्च हो जाएंगे।’ पाटिल साहब की मजबूरी अब समझ में आई लालाजी को। लालाजी ने पाटिल साहब की ओर देखा और बोले, ‘आप बुरा न मानो तो एक सुझाव है जी।’ ‘हां-हां कहिए!’ कह कर साहब ने मुंह के बुझे चुरुट को जलाते हुए चिंतामग्न अवस्था में कहा।
‘आप जी, थोड़ा-बोत रुपया शेयर में लगाया करो।’ लालाजी बोले।
‘पर हमको शेयर्स के बारे में कुछ नहीं मालूम।’ पाटिल साहब एक्सेंट से बोले।
‘अजी, बंदा कब काम आएगा, साड्डा तो धंधा ही ये है।’ लालाजी उमगते हुए बोले। लालाजी आश्चर्यचकित थे कि इस अभेद्य से दिखने वाले किले को किस कदर महंगाई के चूहों ने खा रखा है। खैर, इसके बाद साहब की दोनों बेटियां घर पर आ गईं। लालाजी के यहां आना-जाना शुरू हो गया। पता नहीं, लालाजी ने उन्हें क्या गुर सिखाए कि पाटिल दंपती के मुख पर संतोष के भाव रहने लगे, मातृभाषा हिंदी होने लगी। दो बच्चियों के लालन-पालन, उनके करियर, शादी की चिंता के बादल छंटने लगे। शेयर की आमदनी से घर भी अच्छा सज गया। इधर, कॉलोनी के निवासियों ने अपने बच्चों को इस बिजनेसवाले माहौल से दूर हॉस्टल में डालना शुरू कर दिया, जिससे वे भी पाटिल साहब जैसे रोबीले अफसर बन सकें।
Source : http://www.livehindustan.com/news/tayaarinews/tayaarinews/article1-story-67-67-187478.html