Sunday, August 28, 2011

महंगाई के चूहे -रश्मि गौड़

अभी कुछ दिन पहले लालाजी ने अपने ऊपर का मकान पाटिल साहब को लीज पर दिया था। पाटिल साहब किसी कंपनी में प्रबंध निदेशक थे। भारी किराया अदा करती थी उनकी कंपनी। पाटिल साहब का क्या कहना, गजब का रोब-दाब, शोफर ड्रिवन गाड़ी आती थी उन्हें लेने, चकाचक यूनिफॉर्म में जब शोफर तपाक से गाड़ी का दरवाजा खोलता तो पूरी कॉलोनी के लोग देखते रह जाते।
उस कॉलोनी में अधिकतर निवासी व्यवसायरत थे। उनके बाप-दादे ही ये कोठियां और व्यवसाय विरासत में दे गए थे। किसी की चांदी की दुकान थी, किसी की कपड़े की, तो कोई टेंट की दसियों दुकानें लिए बैठा था। आज तक इस कॉलोनी में कोई भी असली पढ़ा-लिखा नहीं आया था। यूं तो इंटर और मैट्रिक पास कई नौजवान थे, परंतु सभी ने अपने स्कूल लड़खड़ाते हुए पास किए थे। घर में कोई कमी नहीं थी, सो कोई बड़े भाई के साथ लग गया तो कोई पिता का हाथ बंटाने लगा, लाखों के वारे-न्यारे होने लगे, बिजनेस के गुर सीखने व सिखाने में जिंदगी शांति से बीत रही थी कि पाटिल साहब के आने पर मानो तेज हवाएं चलने लगीं। जनाब पाटिल साहब व उनकी पत्नी, जो कि किसी कॉलेज में प्राध्यापिका थीं, की चर्चा घर-घर होने लगी। ज्यों-ज्यों लोग-बाग उनके ठाट-बाट देखते, त्यों-त्यों उनका मन मेलजोल बढ़ाने को करता, पर पाटिल साहब व उनकी पत्नी किसी की ओर देखते भी न थे, धड़ाधड़ सीढ़ियों से नीचे उतरते और गाड़ी में बैठ कर ओझल। अंग्रेजी तो मानो उनकी मातृभाषा थी। लालाजी से भी बस दुआ-सलाम ही थी। घर में एक वृद्धा नौकरानी थी, जो बस सब्जी आदि लेने नीचे उतरती, पर बोलती किसी से भी नहीं थी। बस पाटिल दंपत्ति के जाने के बाद बालकनी में बैठती और सड़क पर आते-जाते लोगों को देखती रहती या सिलाई-बुनाई करती रहती। पाटिल दंपत्ति के आने पर खिड़की बंद हो जाती। ऐसे में भला कॉलोनी की महिलाओं में गजब की बेचैनी हो गई। किटी पार्टीज व ताश पार्टियों में उनकी चर्चा होने लगी। एक दिन मिसेज शर्मा मिसेज खन्ना से बोलीं, ‘अरे, इन मेम साहब को भी मेंबर बनाओ अपने क्लब का।’ ‘हुंह, इनके तो मिजाज ही नहीं मिलते, मेम साब होंगी तो अपने घर की। जितना ये दोनों मिया-बीवी मिल कर कमाते होंगे, उतना तो खन्ना साहब एक दिन में कमा लेते होंगे।’ मिसेज खन्ना ने खिन्न होकर कहा।
‘और क्या, वो मेंबर बनना तो दूर, किसी की ओर देखती तक नहीं।’ मिसेज सिंह को अपना डायमंड सेट पहनना व्यर्थ ही लग रहा था। उधर, लालाजी की ललाइन बड़ी दु:खी थीं। शेयर दलाल लालाजी रोज आकर हजारों रुपए की थैली उनके हाथ में पकड़ाते तो ललाइन की बड़ी इच्छा होती कि ऊपरवाली मेम साब भी देख लें एक नजर, पर उस किले से किसी को देखना तो दूर, एक आवाज भी सुनाई न देती। खैर, इसी प्रकार छह महीने बीत गए, पाटिल साहब से किसी का भी परिचय न हो सका। लालाजी के हाथ में हर पहली तारीख को किराए का चेक आ ही जाता था, सो समझ में ही न आ रहा था कि पहल कैसे की जाए। अचानक एक दिन मानों बिल्ली के भागों छींका टूट गया। पोस्टमैन एक तार लाया, जिसे लालाजी ने पाटिल दंपती के घर पर न होने की वजह से रिसीव कर लिया। जब पाटिल साहब घर पहुंचे तो लालाजी ने उन्हें नीचे नहीं रोका, बल्कि ऊपर जाने दिया, फिर थोड़ी देर बाद ऊपर पहुंच कर घंटी बजाई। पाटिल साहब की वृद्धा नौकरानी ने दरवाजा खोला तो लालाजी बोले, ‘पाटिल साहब से ही काम है, उन्हें बुला दीजिए।’ ‘आप थोड़ा बैठिए, साहब जरा बाथरूम में हैं।’ नौकरानी अंदर चली गई। लालाजी लपक कर ड्राइंग-रूम में जा बैठे। चारों ओर चौकन्नी नजरों से देखने लगे। उन्हें यह देख कर बड़ी हैरत हुई कि इतने बड़े साहब का ड्राइंग-रूम बड़ा ही साधारण था, न ढंग का सोफासेट, खिड़की-दरवाजों पर मामूली परदे, हालांकि रूम सुरुचिपूर्ण सजा था, परंतु ढंग का कोई सामान ड्राइंग-रूम में नहीं था। इतने में पाटिल साहब आ पहुंचे, नमस्ते का जवाब देते हुए आने का मकसद पूछा। जवाब में लालाजी ने वह तार पकड़ा दिया।
टेलीग्राम पढ़ कर पाटिल साहब कुछ गमगीन-से हो गए। लालाजी ने पूछा ‘क्या बात है जी, सब कुशल तो है न?’ उनकी आवाज में अपनेपन का आभास पाकर पाटिल साहब से भी न रहा गया, बोले, ‘मेरी दो बेटियां वैलहैम्स कॉलेज में देहरादून में पढ़ती हैं, पहाड़ों पर ऐजीटेशन चल रहा है, इसलिए वहां से तार आया है कि आकर बच्चों को ले जाएं।’ ‘तो की गल है जी, तुसी जाकर हुणे ही ले आओ। हम आपके घर को देख लेंगे।’ लालाजी ने फौरन मदद का हाथ बढ़ाया। ‘घर की चिंता नहीं ब्रदर, पर ये देहरादून आना-जाना हमारे बजट में नहीं था। अब दो-तीन हजार रुपए यूं ही खर्च हो जाएंगे।’ पाटिल साहब की मजबूरी अब समझ में आई लालाजी को। लालाजी ने पाटिल साहब की ओर देखा और बोले, ‘आप बुरा न मानो तो एक सुझाव है जी।’ ‘हां-हां कहिए!’ कह कर साहब ने मुंह के बुझे चुरुट को जलाते हुए चिंतामग्न अवस्था में कहा।
‘आप जी, थोड़ा-बोत रुपया शेयर में लगाया करो।’ लालाजी बोले।
‘पर हमको शेयर्स के बारे में कुछ नहीं मालूम।’ पाटिल साहब एक्सेंट से बोले।
‘अजी, बंदा कब काम आएगा, साड्डा तो धंधा ही ये है।’ लालाजी उमगते हुए बोले। लालाजी आश्चर्यचकित थे कि इस अभेद्य से दिखने वाले किले को किस कदर महंगाई के चूहों ने खा रखा है। खैर, इसके बाद साहब की दोनों बेटियां घर पर आ गईं। लालाजी के यहां आना-जाना शुरू हो गया। पता नहीं, लालाजी ने उन्हें क्या गुर सिखाए कि पाटिल दंपती के मुख पर संतोष के भाव रहने लगे, मातृभाषा हिंदी होने लगी। दो बच्चियों के लालन-पालन, उनके करियर, शादी की चिंता के बादल छंटने लगे। शेयर की आमदनी से घर भी अच्छा सज गया। इधर, कॉलोनी के निवासियों ने अपने बच्चों को इस बिजनेसवाले माहौल से दूर हॉस्टल में डालना शुरू कर दिया, जिससे वे भी पाटिल साहब जैसे रोबीले अफसर बन सकें।
Source : http://www.livehindustan.com/news/tayaarinews/tayaarinews/article1-story-67-67-187478.html

3 comments:

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा दिनांक 29-08-2011 को सोमवासरीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

prerna argal said...

आपकी पोस्ट ब्लोगर्स मीट वीकली (६) के मंच पर प्रस्तुत की गई है /आप आयें और अपने विचारों से हमें अवगत कराएँ /आप हिंदी के सेवा इसी तरह करते रहें ,यही कामना हैं /आज सोमबार को आपब्लोगर्स मीट वीकली
के मंच पर आप सादर आमंत्रित हैं /आभार /

Ojaswi Kaushal said...

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